कथन की विभिन्न शैलियों का संक्षिप्त परिचय
शैली का अर्थ -
शैली 'शील' धातु से व्युत्पन्न है। न्यतः शैली का आशय लहजा ढंग, परिपाटी, पद्धति,
विधि, तौर तरीका आदि से है। शैली आंग्ल शब्द 'स्टाइल' का समानार्थी है। भाषा के
पूर्व यदि जीवन के सन्दर्भ में शैली का विवेचन किया जाए तो स्पष्ट होगा कि मानवीय
जीवन में शैली अत्यन्त महत्वपूर्ण है। हमारा उठना-बैठना, खाना-पीना, आचार-विचार
एवं आचरण हमारी विशिष्ट शैली के ही द्योतक हैं, इस प्रकार हमारा व्यक्तित्व ही
हमारी शैली है। शैली व्यक्ति के अनुरूप अलग-अलग होती है, इसलिए कहा भी गया है
'व्यक्तित्व ही शैली है और शैली ही व्यक्तित्व है
भाषा के
परिप्रेक्ष्य में शैली का विवेचन यह स्पष्ट करता है कि मनुष्य अपने भाव अथवा
विचारों को समुचित ढंग से व्यक्त करने के लिए भाषा में अनेक प्रयोग करता है। वक्ता
को सदैव यही इच्छा रहती है, कि वह अपनी बात स्पष्ट रूप से दूसरों तक पहुंचा सके,
इस अर्थ में शैली अभिव्यक्ति की विशेष प्रणाली है, जिसके द्वारा कोई रचना आकर्षक,
रमणीय, मोहक और प्रभावपूर्ण हो जाती है।
शैली की परिभाषा
- सरल भाषा में कहा जा सकता है-अनुभूत विषय वस्तु को अभिव्यक्ति को सुन्दर एवं
प्रभावपूर्ण बनाने वाले तरीके को एक शब्द में शैली के रूप में अभिहित किया जाता
है।
डॉ. जॉनसन के
अनुसार-“शैली सामान्य व्यवहार में बातचीत करने का ढंग या लहजा है।"
बर्नार्ड शॉ का
विचार है—“प्रभावपूर्ण अभिव्यक्ति हो शैली का अर्थ और इति है "
डॉ. गुलाबराय के
अनुसार-शैली अभिव्यक्ति के उन गुणों को कहते हैं, जिन्हें लेखक या कवि अपने मन के
प्रभाव को सामान्य रूप में दूसरों तक पहुँचाने के लिए अपनाता है।"
डॉ. मिश्र के
शब्दों में, "किसी
वर्णनीय विषय के स्वरूप को खड़ा करने के लिए उपयुक्त शब्दों का चयन और उसकी योजना
को शैली कहते हैं।"
प्लेटो के
अनुसार-"जब
विचारों को तात्विक रूपाकार दे दिया जाता है तो शैली का उदय होता है।"
शैली का महत्व -
व्यावहारिक जीवन में शैली अत्यन्त महत्वपूर्ण है। हमारे दैनिक व्यवहार, बोलचाल,
पारिवारिक जीवन, अपरिचितों व परिचितों से वार्तालाप, अध्ययन, अध्यापन, सार्वजनिक
क्षेत्र कुल मिलाकर मानवीय जीवन के समग्र क्षेत्रों में शैली उपादेय है। हम अपनी
विनम्रता के द्वारा ही दूसरों को सहज ही आकर्षित करते हैं और भाषा माधुर्य एवं
वाकपटुता से व्यक्तिगत एवं सामाजिक हितों का सम्पादन कर पाते हैं, अतएव जीवन के
सभी क्षेत्रों में शैली का महत्व है।
शैली के तत्व -
प्रमुखतः दो तत्व माने गए हैं--(1) आन्तरिक तत्व (2) बाह्य तत्व
1. आन्तरिक तत्व
- शब्द शक्ति एवं शब्द गुण शैली के आन्तरिक तत्व माने जाते हैं। इसके अन्तर्गत
शब्द की अमिधा, लक्षणा, व्यंजना आदि शब्द शक्तियाँ तथा ओज, माधुर्य, प्रसाद आदि
शब्द गुण शैली के आन्तरिक तत्व हैं।
2. बाह्य तत्व -
शैली के छः बाह्य तत्व माने गये हैं, जो निम्नलिखित हैं-
(1) ध्वनि योजना
- वाक्यों की रचना ध्वनि समूहों से ही होती है। अतः प्रसंग के अनुसार ध्वनियों को
योजना अपेक्षित होती है। ध्वनियाँ सुनने में कटु न हो इस बात का ध्यान रखा जाना
चाहिए।
(2) शब्द योजना
- शब्द ध्वनियों का ही साकार रूप है। रचना में सदैव सार्थक शब्दों का प्रयोग किया
जाना चाहिए।
(3) वाक्य योजना
- मनुष्य अपनी भावाभिव्यक्ति वाक्य में करता है। इसलिए वाक्य भाषा की पूर्ण इकाई
है। अतः वाक्य के सम्बन्ध में कुछ बातों का ध्यान रखा जाना चाहिए। वाक्य योजना में
एक वाक्य में एक ही विचार समाहित हो। शब्दों का प्रयोग व्याकरण के नियमों के
अनुरूप हो। वाक्य में पदक्रम, वाक्य को पूर्णता, आकार, ध्वनि तथा अर्थ आदि का
ध्यान रखा जाना चाहिए।
(4) अनुच्छेद
योजना - एक अनुच्छेद में एक ही प्रसंग व विचार समाविष्ट होना चाहिए। नये अनुच्छेद
के प्रारम्भ में उस अनुच्छेद में व्यक्त विचारों का सार या संकेत होना चाहिए। इस
प्रकार अनुच्छेद में विचारों को क्रमबद्धता का ध्यान रखा जाना चाहिए।
(5) प्रकरण
योजना - अनुच्छेदों से प्रकरण बनता है। अतः प्रकरण में आवश्यकतानुसार अनुच्छेदों
का प्रयोग करना चाहिए। प्रकरण में मुख्य विषय को महत्व मिलना चाहिए तथा प्रकरण का
आरम्भ व अन्त सुन्दर ढंग से करना चाहिए।
(6) चिह्न -
विचार-भाषा में प्रयुक्त होने वाले विराम चिह्नों के यथास्थान प्रयोग से अर्थबोध
में सुविधा होती है। अतः विभिन्न विराम चिह्नों को लगाने में पूरी सावधानी बरतनी
चाहिए।
कथन शैली के
प्रकार -
कथन शैली के
मुख्य रूप से चार प्रकार हैं - (1) व्याख्यापरक या व्याख्यात्मक, (2) विवरणपरक या
विवरणात्मक, (3) मूल्यांकनपरक, (4) विचारात्मक शैली
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